जस्टिस बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की सुप्रीम
कोर्ट पीठ में अन्य दो जज- पी. एस. नरसिम्हा और संजय कुमार थे।
क्या
था मामला?
‘मोदी सरनेम मानहानि’ के मामले में गुजरात के
सूरत कोर्ट ने जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत राहुल गाँधी को 2 साल की सज़ा
सुनाई थी, जिससे उनकी वायनाड संसद सदस्यता ख़त्म हो गई थी। मानहानि का आरोप सूरत
पश्चिम सीट से वर्तमान बीजेपी विधायक ‘पूर्णेश मोदी’ ने साल 2019 में लगाया था, जब
राहुल गाँधी ने कोलार (कर्नाटक) की एक रैली में “मोदी चोर हैं” जैसे शब्दों का
इस्तेमाल किया था।
क्या
कहा सुप्रीम अदालत ने?
जस्टिस गवई ने कहा कि “न्यायाधीश से अधिकतम सज़ा देने के लिए कारण
बताने की अपेक्षा की जाती है, ख़ासकर
जब अपराध “गैर-संज्ञेय, जमानती और समझौता योग्य हो''।
पीठ ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें
अधिकतम दो साल की सज़ा देने का कोई कारण नहीं बताया है, जिसके कारण जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (3) के तहत उन्हें अयोग्य घोषित किया गया था।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी की खिलाफत
में कहा कि “गाँधी की कथित टिप्पणी, यदि
की गई, तो अच्छे स्वाद, अच्छे लहज़े में नहीं
थी।“
'आपसी सम्मान की ज़रुरत'
राहुल गाँधी के वकील
मनु सिंघवी ने कहा कि “लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह है।
राजनीति में परस्पर सम्मान होना चाहिए।“
सुनवाई के दौरान, सिंघवी ने कहा कि “उन्होंने मानहानि का कोई अन्य मामला नहीं देखा है,
जिसमें किसी आरोपी को अधिकतम दो साल की सज़ा दी गई हो।“
ऐसे ही एक मामले में, इसी साल मार्च में ‘केरल
उच्च न्यायालय’ ने लक्षद्वीप के सांसद और एनसीपी नेता ‘पी. पी. मोहम्मद’ फैजल के
ख़िलाफ़ कवारत्ती जिला और सत्र न्यायालय द्वारा हत्या के प्रयास के मामले में दिए गए
सज़ा के फ़ैसले को निलंबित कर दिया था।
क्या
है मान/प्रतिष्ठा (Fame)?
प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति की ज़िंदगी का एक आंतरिक हिस्सा होती है। व्यक्ति
अपने सम्मान और नाम की वैसे ही परवाह करते हैं, जैसे अपनी जान की करते हैं। ‘सुब्रमण्यम
स्वामी बनाम भारत संघ (2016)’ के
मामले में आपराधिक मानहानि के अपराध की संवैधानिक
वैधता को चुनौती दी गई थी,
जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “प्रतिष्ठा
का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के
तहत संरक्षित है”। भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत भी “किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक बयान देकर या कुछ प्रकाशित
करके उसकी प्रतिष्ठा पर हमला करने को” मानहानि माना गया है।
मानहानि
के प्रकार
मानहानि
दो प्रकार की होती है- परिवाद और बदनामी।
एस.टी.एस राघवेंद्र चारी बनाम चेगुरी वेंकट
लक्ष्मा रेड्डी (2018) के मामले में ‘आंध्र प्रदेश’ के उच्च न्यायालय द्वारा
परिवाद और बदनामी के बीच स्पष्ट अंतर किया गया था। बदनामी, एक झूठा और हानिकारक बयान है जो मौखिक रूप से
एक अस्थायी प्रकृति का है। अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में पढ़े जाने पर परिवाद का
व्यापक दायरा होता है। हालाँकि, बदनामी और परिवाद, दोनों को नुकसान पहुँचाने के लिए किसी
व्यक्ति के ख़िलाफ़ झूठी टिप्पणियों के प्रकाशन की आवश्यकता होती है और इनमें अंतर प्रकाशन के तरीके में निहित होता है।
मानहानि
का अपराध
‘भारतीय
दंड संहिता, 1860’ की धारा 499,
500, 501 और
502 मानहानि के अपराध के संबंध में प्रावधान करती हैं।
धारा-499 मानहानि और इसके अपवादों का
व्यापक-विस्तृत उल्लेख करती है। इन प्रावधानों के अनुसार अपराध की तीन आवश्यक
बातें हैं-
1. अभियोग लगाना या प्रकाशित करना
2. आरोपण का साधन
3. प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का इरादा
मानहानि
का स्पष्टीकरण
मानहानि
को स्पष्ट करने के लिए धारा-499 के
साथ 4 स्पष्टीकरण हैं- 1. मृतकों
की बदनामी, 2. किसी कंपनी की मानहानि या व्यक्तियों
का संग्रह, 3. छल-कपट से मानहानि
धारा-499 के
स्पष्टीकरण 4 में कहा गया है कि यह किसी व्यक्ति की
नैतिकता या बुद्धि को कम करने को संदर्भित करता है। साथ ही, किसी पर जातिगत टिप्पणी
करना, उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना या उसकी साख कम करना भी अपराध में शामिल होता
है।
मानहानि
के अपवाद
धारा-499 में
कुछ अपवाद हैं जो लोगों को ऐसे शब्द बोलने, लिखने
या प्रकाशित करने की अनुमति देते हैं, जिन्हें मानहानिकारक सामग्री के तहत माफ़
किया जा सकता है; जैसे- किसी भी सार्वजनिक प्रश्न को छूने वाले किसी भी व्यक्ति का
आचरण
जब किसी सार्वजनिक प्रश्न के संबंध में
सद्भावनापूर्वक कोई बयान दिया जाता है, तो
उसे तीसरे अपवाद के तहत संरक्षित किया जाता है। उदहारण- ‘जवाहरलाल दर्डा बनाम
मनोहरराव गणपतराव कपिस्कर (1998)’ के मामले में एक प्रकाशक, जिसने
सरकारी धन के दुरुपयोग के संबंध में एक मंत्री के ख़िलाफ़ एक बयान प्रकाशित किया था, को मानहानि के अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया
था।
मानहानि
के लिए सज़ा
मानहानि के अपराध के लिए धारा 500, 501 और 502
में सजा का प्रावधान है, जिसके तहत साधारण कारावास से दंडित किया जाता है जिसे 2 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है या जुर्माना या
दोनों से दंडित किया जा सकता है।
विधायक/सांसद
के दोषी होने की स्थिति में
RPA की
धारा-8(3) में कहा गया है कि यदि किसी सांसद को
दोषी ठहराया जाता है और कम-से-कम 2
वर्ष की कैद की सज़ा सुनाई जाती है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
हालाँकि, इस धारा में यह भी कहा गया है कि
अयोग्यता दोषसिद्धि की तारीख़ से तीन महीने बीत जाने के बाद ही प्रभावी होती
है।
इस अवधि के भीतर सज़ायाफ्ता सांसद सज़ा के ख़िलाफ़
उच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है, जैसा कि राहुल गाँधी ने किया है।
भारत
में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सीमाएँ/मानहानि कानून
संविधान का अनुच्छेद-19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान
करता है। हालाँकि, अनुच्छेद-19 (2) ने
इस स्वतंत्रता की कुछ सीमाएँ भी निर्धारित
की हैं; जैसे- न्यायालय की अवमानना, मानहानि
और अपराध के लिए उकसाना।
अन्य
‘मानहानि
विधेयक (डिफेमेशन बिल),
1988’ को राजीव गांधी सरकार के वक़्त में पेश किया गया था, लेकिन इसके कठोर प्रावधानों के कारण विपक्ष और
मीडिया की व्यापक आलोचना के बाद इसे वापस ले लिया गया था।

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