Saturday, 13 January 2024

पतंग मन-तरंग


 

    जिन पतंगों के लिए मुहल्ले-मुहल्ले दौड़े फिरते थे, आयरन डोम सरीखी तकनीकों से पतंगें छतों पर खींचते थे, दुकानों से बैकडोर से पतंगें लाते थे और लुका-छुपी अवैध ढंग से विस्फोटक की भांति पन्नी की पतंगें बनाते थे, अब उन पतंगों की एक प्रतिनिधि पतंग को छत पर पड़ा देखकर, सहसा वो उल्लास-उत्साह नहीं उभरा; ठहराव लेकर जब स्मृति में बचपन का रिकेप हुआ, तो उल्लास कोहरे से यकायक छंटे सूरज की भांति फूट पड़ा। 


 

                                            (गाँव में छत पर मिली पतंग)


  आज मकर संक्रांति है यानी भारतवर्ष की पतंगों का दिन और पतंगबाज़ों का त्योहार। इस दिन की पौराणिक मान्यता भी है और वैज्ञानिक महत्व भी। त्रेतायुग में राम ने भाइयों संग पतंगें उड़ाई थीं, वहीं से आज के टोलीनुमा पतंग महोत्सव की नींव रखी गई होगी। इसी दिन सूरज धनु से मकर राशि में दस्तक देता है, जिससे सूरज की किरणें रामबाण की तरह चर्म रोगों और कईं संक्रामक बीमारियों के लिए अचूक औषधि का काम करने लायक़ बन जाती हैं। 


 बचपन में सोचता था कि पतंगबाज़ी, कबूतरबाज़ी की तरह गँवारों का एक गँवई खेल है, लेकिन आज जब देश में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव में पचास से ज़्यादा देशों के पतंगबाज़ों का जुटान देखता हूँ और मेगा-सिटीज़ में पतंगों के उत्सव का आयोजन देखता हूँ, तो समझता हूँ कि गाँव की पतंग परंपरा, पतंगबाज़ और उनका आकाश बेहद सीमित है या था। 


  कोरोना जैसी आपातकालीन स्थिति ने भी पतंगों को उनका आकाश दिया था, लेकिन तब भी पतंगें बस उड़ा सकते थे, छत-छत और पड़ोस-पड़ोस जाकर लूट नहीं सकते थे। 


  सोशल मीडिया क्रांति ने गाँव-देहात के छुटभैया खेल विद्रोहों को दबा दिया है। अब गँवई आकाश में पतंगों का शामियाना नहीं दिखता, छतों पर बाँस-खपच्चियों के काँटे नहीं दिखते और गलियों में बच्चों या पतंगबाज़ों की भीड़ नहीं दिखती। वे दिन भी क़ाबिल-ए-ग़ौर होंगे, जब गँवई पतंगबाज़ी उत्सव और खेल के काकून से बाहर निकलकर, टी-10 क्रिकेट स्ट्रीट लीग की तरह एक खेल प्रतियोगिता का रूप लेगी या कंचों, ताश या लूडो के खेलों की तरह विलुप्ती की तरफ़ बढ़ेगी।


  ~अंकुर