Wednesday, 21 September 2022


 


ग़ज़ल: हो न सकी ज़िंदगी जिसकी



ग़मों के साथ अपने जुदा हो गये

हँसते-हँसाते लोगों से विदा हो गये


दिखी न बेबसी नाज़रीन को

क़लाबाज़ी पर मदारी की फ़िदा हो गये 


हो न सकी ज़िंदगी जिसकी

वह अपने हुनर के ख़ुदा हो गये


लड़ाने वाले हुये ज़मींदोज़ 

हँसाने वाले नस्ब-शुदा हो गये 


यद-ए-क़ुदरत की फ़िक्र किसे

जगह-जगह जब से मयकदा हो गये



~अंकुर 'आब'