ग़ज़ल: हो न सकी ज़िंदगी जिसकी
ग़मों के साथ अपने जुदा हो गये
हँसते-हँसाते लोगों से विदा हो गये
दिखी न बेबसी नाज़रीन को
क़लाबाज़ी पर मदारी की फ़िदा हो गये
हो न सकी ज़िंदगी जिसकी
वह अपने हुनर के ख़ुदा हो गये
लड़ाने वाले हुये ज़मींदोज़
हँसाने वाले नस्ब-शुदा हो गये
यद-ए-क़ुदरत की फ़िक्र किसे
जगह-जगह जब से मयकदा हो गये
~अंकुर 'आब'
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