Sunday, 11 August 2024

युद्धरत यूक्रेन के खेल-योद्धा

 


"बिजली और पानी के बगैर अंधेरे, सर्दी और गर्मी में हमने अनेक घंटे गुज़ारे हैं। मुझे लगता है कि हम सब कुछ से गुज़र चुके हैं।" 

 

 यह दुर-अनुभूति महज़ यूक्रेन ओलंपिक दल का हिस्सा रहे फेंसर व्लादा खार्कोवा की नहीं, समूचे यूक्रेनवासी पिछले ढाई बरस से इस यातना-प्रताड़ना से गुज़र रहे हैं। जिन लोगों के घरों पर लगातार बारूद बरस रहा हो और जिस देश के आसमाँ पर दिन-रात मिसाइलें व रॉकेट की गश्त लगी हों, उस देश के खिलाड़ी किसी खेल महाकुंभ में प्रतिभाग करते हुए अपने बीते एक दशकीय प्रदर्शन से बेहतर खेल प्रदर्शन करके 12 मेडल अपने देश को समर्पित कर दें और 17 दिनों की खेलावधि में 3 बार देश का एंथम बजने की गर्वानुभूति करें, यह किसी मरणासन्न शख़्स को मिली ज़िंदगी की उम्मीद से कम नहीं। यूक्रेन ने ज़ारी इस युद्ध में 400 से अधिक खिलाड़ियों को खोया है और 15 से अधिक ओलंपिक ट्रेनिंग सेंटर्स व 150 से अधिक खेल संरचनाओं को ख़ाक बनते देखा है। अभी भी हजा़रों खिलाड़ी मातृभूमि की रक्षा में रिंग, मैट, ट्रैक, फ़ील्ड और कोर्ट को छोड़कर सरहदों पर डटे हैं।


 यूक्रेन जो टोक्यो ओलंपिक के कुछ दिन बाद से ही आग में तप रहा है और अंधेरे में जी रहा है, के ओलंपिक इतिहास के सर्वाधिक कम संख्यीय दल के 140 खिलाड़ियों ने 3 गोल्ड, 5 सिल्वर और 4 ब्रॉन्ज मेडल समेत कुल 12 ओलंपिक मेडल के साथ पेरिस ओलंपिक में न सिर्फ़ शानदार प्रदर्शन किया है, बल्कि रियो और टोक्यो ओलंपिक्स के बाद पहली बार 1 से अधिक गोल्ड मेडल भी हासिल किए हैं। वहीं यूक्रेन ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में अपने ओलंपिक पदार्पण के बाद से पहली बार किसी ओलंपिक खेल इवेंट के पॉडियम पर दो भिन्न-भिन्न रंग मेडल के साथ उपलब्धि दर्ज़ की है। वूमेंस हाई जंप इवेंट में यारोस्लावा महोचिख और इरयना हेरासचेंको ने क्रमश: गोल्ड व ब्रॉन्ज मेडल पर कब्ज़ा किया। 




(यारोस्लावा महोचिख और इरयना हेरासचेंको)


 5 बार की ओलंपियन, 36 वर्षीय साबरे फेंसर ओल्गा खरलान ने दो अलग-अलग खेल इवेंट में मेडल के साथ दूसरी बार किसी ओलंपिक में दो मेडल जीते हैं। खरकान ने एकल वूमेंस साबरे में ब्रॉन्ज और टीम इवेंट में गोल्ड मेडल जीता है। वह तीसरी बार की ओलंपिक एकल ब्रॉन्ज मेडलिस्ट और दूसरी बार की टीम गोल्ड मेडलिस्ट है। खरलान के लिए केवल टोक्यो ओलंपिक मेडल रहित रहा था, जब वह राउंड ऑफ़ 32 में ही चीनी फेंसर यांग हई से हारकर बाहर हो गई थी। ग़ौरतलब है कि खरलान यूक्रेन की वह लीजेंड फेंसर है जिसका नाम इंटरनेशनल फेंसिंग फेडरेशन के हॉल ऑफ़ फेम में दर्ज़ है, जिसने वर्ल्ड चैंपियनशिप में एक दर्ज़न गोल्ड और दर्ज़नभर से अधिक कुल चैंपियनशिप मेडल अपने नाम किए हैं। गत वर्ष फेंसिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप में अपनी रूसी प्रतिद्वंद्वी से हाथ न मिलाने के उनके स्वदेशीय दुख को भी नहीं भूलाया जा सकता।



                                          (ओल्गा खरलान)


  यूक्रेन के खिलाड़ियों ने ओलंपिक के आदर्श सिटियस, अल्टियस और फोर्टियस पा लिया है। उनकी खेल क्षमताओं की तेज़ी, ख़्वाबों की ऊँचाई और मनोबल की मज़बूती ने देश के तौर पर यूक्रेन की जीवटता को विश्व के आगे फिर से साबित कर दिया।


  ~अंकुर

Friday, 2 August 2024

क्या लक्ष्य हासिल करेगा बड़ा लक्ष्य?

 



   लक्ष्य ग्रुप स्टेज में सीडेड इंडोनेशियाई जोनाथन क्रिस्टी को सीधे सेटों में हराकर राउंड 16 में पहुँचा था, जबकि प्रणय ने अन-सीडेड जर्मन फैबियन रॉथ को सीधे सेटों में हराया, तो वियतनामी ली डक फात के सामने उसे जीत के लिए जूझना पड़ा था। 


 अब क्वार्टर फाइनल में लक्ष्य के आगे ताइवानी चोऊ तिआन चेन होगा, जो वर्ल्ड चैंपियनशिप का मेडलिस्ट है, लेकिन लक्ष्य प्रणय की तरह ही उसकी उम्र से भी खेल सकता है। हेड-टू-हेड मुक़ाबलों का चिट्ठा उठाकर देखें, तो 4 में से 3 चोऊ ने ही जीते हैं। यदि लक्ष्य चोऊ के चक्रव्यूह को भेद जाता है, तो क्वार्टर फाइनल को फाँदकर ओलंपिक सेमीज में पहुँचने वाला पहला भारतीय शटलर बन जाएगा। 


 आगे सेमीज के समर-संग्राम में लक्ष्य को टोक्यो ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट, सवा छह फीट क़द के मालिक, डेनमार्कियन स्मैश-शॉवर विक्टर अलेक्सन से भिड़ना होगा या सिंगापुरी सीडेड, वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडलिस्ट लो केन येओ से। लो केन विक्टर से क्वार्टर फाइनल जीत जाता है, तो लक्ष्य को सेमीज में उसे हराना आसान होना। लक्ष्य ने लो केन के साथ हुए 9 में से 6 मुक़ाबलों में जीत से उसे कमज़ोर साबित किया है। हालाँकि लो केन और विक्टर अलेक्सन का हे-टू-हेड रिकॉर्ड इसकी गवाही नहीं देता कि लो केन आगे बढ़ेगा। विक्टर ने 10 में से 8 मुक़ाबलों में लो केन को हराया है। यदि विक्टर ही सेमीज में लक्ष्य के सामने रहा, तो मैच इतिहास तो लक्ष्य को विक्टर पर लीड नहीं देता, लेकिन छरहरे बदन का लक्ष्य अपनी तांडव समान क़दमताल और कर्कश कलाइयों से कमाल दिखा सकता है और ओलंपिक पुरुष बैडमिंटन के पहले भारतीय मेडल से ख़ुद को सज्जित कर सकता है।


  ~अंकुर

Friday, 26 July 2024

शूटिंग रेंज से बाहर का सौरभ

 


  सौरभ का तहज़ीबी मिज़ाज जितना बेशोख़ था, उसका खेल उतना ही शोख़ और निशाना सटीक था, लेकिन 580 के पॉइंट-स्कोर को किसी आम के दरख़्त पर निशाना लगाने जैसी आसानी से हासिल कर लेने वाले निशानची को 570 तक का पॉइंट-स्कोर हासिल करने के लिए जूझते देखना, एक सद्योजात धूमकेतू के गिरकर टूटते देखने जैसा है। जिस शूटर ने विश्व पटल पर 8 वर्ल्ड कप, वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन गेम्स जैसे आदि टूर्नामेंटों में ख़ुद को अपराजेय और अपने निशाने को अचूक साबित किया हो, उस शूटर का अपने देश के नेशनल गेम्स में टॉप 20 रैंकिंग-स्थान से बाहर रहना, उस पर निराशा-हताशा का पहाड़ टूटने जैसा है। 


   साल 2016 से 2020 तक सौरभ ने अपनी टीनेज़ में ही भारतीय शूटिंग पर राज़ किया। टोक्यो ओलंपिक में भारत के 15 शूटर्स के दल से अकेला सौरभ क्वालीफिकेशन राउंड को पारकर फाइनल में पहुँचा था। 10 मी. एयर पिस्टल मिक्स स्पर्धा के क्वालीफिकेशन राउंड में उसने मनु भाकेर के साथ ओलंपिक रिकॉर्ड भी बनाया था। टोक्यो ओलंपिक में भारतीय गोल्ड मेडल का बड़ा दावेदार माना गया सौरभ, असफलता के बाद लगातार पतन की ओर जाता रहा। वर्ल्ड चैंपियनशिप, हांगझोऊ एशियन गेम्स और अब पेरिस ओलंपिक में 22 वर्षीय सौरभ का न दिखना भारतीय क्रिकेट वर्ल्ड कप टीम में विराट कोहली के न दिखने जैसा है, लेकिन काश शूटिंग भी क्रिकेट जैसा खेल होता, जिसमें टीम में सलेक्शन के लिए ज़ारी फार्म नहीं, नाम को तवज्जो दी जाती! क्रिकेट में 22 वर्ष की उम्र पदार्पण की उम्र होती है और शूटिंग का एक सूरज मध्याह्न के बाद ही अस्त हो गया लगता है। 


 बीते दिनों में भारतीय शूटिंग ने जीतू राय और अपूर्वी चंदेला जैसे सहसा सुप्त हुए शूटर्स भी देखे हैं, लेकिन सौरभ को अभी बहुत आगे जाना है; किसी को सौरभ के लिए शूटिंग के जांबवंत का क़िरदार निभाना होगा। सौरभ अपनी ताक़त को भूल गया है, उसकी आँखों के आगे खड़ा वही बौना लक्ष्य अब विराट नज़र आता है।


  उम्मीद कि निशानों की दौड़ में पिछड़ा सौरभ, फिर उठ दौड़ेगा और पॉडियम के सबसे ऊपरी पायदान पर चौधराहट से खड़ा होगा!


  ~अंकुर

Sunday, 21 April 2024

कुहू कोर्ट से पुलिस कप्तान तक


 


    जिस कुहू का ख़्वाब था कि 2024 के पेरिस ओलंपिक में भारत के लिए खेले और गोल्ड मेडल जीते, उस कुहू गर्ग ने हाल ही में यूपीएससी द्वारा जारी रिजल्ट में 178वीं रैंक हासिल करके जहां एक ओर उनके और बैडमिंटन के खेल प्रशंसकों की उम्मीदों पर विराम लगा दिया, वहीं दूसरी ओर उसने महिला वर्ग का सुहास यथिराज बनने का संकेत भी दे दिया। प्रशासन के क्षेत्र से आने वाला सुहास पैरा बैडमिंटन का वह नाम है, जिसने देश को बड़े खेल मंचों पर गौरवान्वित किया है।


   कभी 2022 के ब्रिस्बेन राष्ट्रमंडल खेल और 2023 के ग्वांगझू एशियाई गेम्स को भी अपना ख़्वाब मानने वाली कुहू पिछले कुछ वर्षों से बैडमिंटन कोर्ट से नदारद दिख रही थी, जिसकी वज़्ह यूपीएससी रिजल्ट के दिन ही ज़ाहिर हो सकी। कुहू ने अपना एक ऐसा ख़्वाब पूरा किया, जिस पर उसका हक़ उतना ही था, जितना कि बैडमिंटन पर। कुकू को बैडमिंटन के अलावा टेनिस, घुड़सवारी, तैराकी, कथक नृत्य और संगीत सुनने-गाने का शौक़ रहा था, लेकिन 2020 के बाद अचानक कुहू के शौक़ों और ख़्वाबों ने करवट बदली और वह अपनी प्रेरणा माने जाने वाले अपने पिता के पेशे पर आकर रुक गई है। ग़ौरतलब है कि कुहू के पिता अशोक कुमार रिटायर्ड आईपीएस और उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी रहे हैं। उनके कहने पर ही कुहू ने महज़ 9 वर्ष की उम्र में रॉकेट उठाया था। इसके बाद उसने ज़िले से लेकर प्रदेश और फिर देश व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने खेल का लोहा मनवाया। 


  कुहू बैडमिंटन मिक्सड डबल की धुरंधर खिलाड़ी है। उसने सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में सिल्वर और ब्रांज मेडल समेत बैडमिंटन साउथ एशियन गेम्स चैंपियनशिप और अनेक इंटरनेशनल बैडमिंटन ओपन चैंपियनशिप में दर्जनों मेडल जीते हैं। वह प्रीमियर बैडमिंटन लीग (PBL) में भी कईं सालों तक मुंबई रॉकेट्स के लिए खेली है। डबल कुहू की पसंदीदा बैडमिंटन कैटेगरी रही है, जिसमें उसने ध्रुव रावत और रोहन कपूर के साथ अनेक चैंपियनशिप जीती हैं।


   दो बार के ओलंपियन और पांच बार के वर्ल्ड चैंपियन चीनी लिन डान को अपना आदर्श मानने वाली और डबल के धुरंधर शटलर दक्षिण कोरियाई लिन यांग डे से प्रभावित होने वाली कुहू ने बहुत छोटी-सी उम्र में साइना नेहवाल को देखकर कोर्ट पर क़दम बढ़ाए थे। उसकी गति और मति उसे कोर्ट पर डबल बैडमिंटन की बेजोड़ खिलाड़ी साबित करती थी।


 अब देखना होगा कि क्या कुहू प्रशासन के कोर्ट पर ही अपने तीव्र फ़ैसलों और सटीक सर्विसों को आगे बढ़ाती है या अपने पुराने पेशे बैडमिंटन के कोर्ट पर भी परस्पर प्रतिस्पर्धा करती दिखेगी!



 ~अंकुर

Saturday, 13 January 2024

पतंग मन-तरंग


 

    जिन पतंगों के लिए मुहल्ले-मुहल्ले दौड़े फिरते थे, आयरन डोम सरीखी तकनीकों से पतंगें छतों पर खींचते थे, दुकानों से बैकडोर से पतंगें लाते थे और लुका-छुपी अवैध ढंग से विस्फोटक की भांति पन्नी की पतंगें बनाते थे, अब उन पतंगों की एक प्रतिनिधि पतंग को छत पर पड़ा देखकर, सहसा वो उल्लास-उत्साह नहीं उभरा; ठहराव लेकर जब स्मृति में बचपन का रिकेप हुआ, तो उल्लास कोहरे से यकायक छंटे सूरज की भांति फूट पड़ा। 


 

                                            (गाँव में छत पर मिली पतंग)


  आज मकर संक्रांति है यानी भारतवर्ष की पतंगों का दिन और पतंगबाज़ों का त्योहार। इस दिन की पौराणिक मान्यता भी है और वैज्ञानिक महत्व भी। त्रेतायुग में राम ने भाइयों संग पतंगें उड़ाई थीं, वहीं से आज के टोलीनुमा पतंग महोत्सव की नींव रखी गई होगी। इसी दिन सूरज धनु से मकर राशि में दस्तक देता है, जिससे सूरज की किरणें रामबाण की तरह चर्म रोगों और कईं संक्रामक बीमारियों के लिए अचूक औषधि का काम करने लायक़ बन जाती हैं। 


 बचपन में सोचता था कि पतंगबाज़ी, कबूतरबाज़ी की तरह गँवारों का एक गँवई खेल है, लेकिन आज जब देश में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव में पचास से ज़्यादा देशों के पतंगबाज़ों का जुटान देखता हूँ और मेगा-सिटीज़ में पतंगों के उत्सव का आयोजन देखता हूँ, तो समझता हूँ कि गाँव की पतंग परंपरा, पतंगबाज़ और उनका आकाश बेहद सीमित है या था। 


  कोरोना जैसी आपातकालीन स्थिति ने भी पतंगों को उनका आकाश दिया था, लेकिन तब भी पतंगें बस उड़ा सकते थे, छत-छत और पड़ोस-पड़ोस जाकर लूट नहीं सकते थे। 


  सोशल मीडिया क्रांति ने गाँव-देहात के छुटभैया खेल विद्रोहों को दबा दिया है। अब गँवई आकाश में पतंगों का शामियाना नहीं दिखता, छतों पर बाँस-खपच्चियों के काँटे नहीं दिखते और गलियों में बच्चों या पतंगबाज़ों की भीड़ नहीं दिखती। वे दिन भी क़ाबिल-ए-ग़ौर होंगे, जब गँवई पतंगबाज़ी उत्सव और खेल के काकून से बाहर निकलकर, टी-10 क्रिकेट स्ट्रीट लीग की तरह एक खेल प्रतियोगिता का रूप लेगी या कंचों, ताश या लूडो के खेलों की तरह विलुप्ती की तरफ़ बढ़ेगी।


  ~अंकुर