सौरभ का तहज़ीबी मिज़ाज जितना बेशोख़ था, उसका खेल उतना ही शोख़ और निशाना सटीक था, लेकिन 580 के पॉइंट-स्कोर को किसी आम के दरख़्त पर निशाना लगाने जैसी आसानी से हासिल कर लेने वाले निशानची को 570 तक का पॉइंट-स्कोर हासिल करने के लिए जूझते देखना, एक सद्योजात धूमकेतू के गिरकर टूटते देखने जैसा है। जिस शूटर ने विश्व पटल पर 8 वर्ल्ड कप, वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन गेम्स जैसे आदि टूर्नामेंटों में ख़ुद को अपराजेय और अपने निशाने को अचूक साबित किया हो, उस शूटर का अपने देश के नेशनल गेम्स में टॉप 20 रैंकिंग-स्थान से बाहर रहना, उस पर निराशा-हताशा का पहाड़ टूटने जैसा है।
साल 2016 से 2020 तक सौरभ ने अपनी टीनेज़ में ही भारतीय शूटिंग पर राज़ किया। टोक्यो ओलंपिक में भारत के 15 शूटर्स के दल से अकेला सौरभ क्वालीफिकेशन राउंड को पारकर फाइनल में पहुँचा था। 10 मी. एयर पिस्टल मिक्स स्पर्धा के क्वालीफिकेशन राउंड में उसने मनु भाकेर के साथ ओलंपिक रिकॉर्ड भी बनाया था। टोक्यो ओलंपिक में भारतीय गोल्ड मेडल का बड़ा दावेदार माना गया सौरभ, असफलता के बाद लगातार पतन की ओर जाता रहा। वर्ल्ड चैंपियनशिप, हांगझोऊ एशियन गेम्स और अब पेरिस ओलंपिक में 22 वर्षीय सौरभ का न दिखना भारतीय क्रिकेट वर्ल्ड कप टीम में विराट कोहली के न दिखने जैसा है, लेकिन काश शूटिंग भी क्रिकेट जैसा खेल होता, जिसमें टीम में सलेक्शन के लिए ज़ारी फार्म नहीं, नाम को तवज्जो दी जाती! क्रिकेट में 22 वर्ष की उम्र पदार्पण की उम्र होती है और शूटिंग का एक सूरज मध्याह्न के बाद ही अस्त हो गया लगता है।
बीते दिनों में भारतीय शूटिंग ने जीतू राय और अपूर्वी चंदेला जैसे सहसा सुप्त हुए शूटर्स भी देखे हैं, लेकिन सौरभ को अभी बहुत आगे जाना है; किसी को सौरभ के लिए शूटिंग के जांबवंत का क़िरदार निभाना होगा। सौरभ अपनी ताक़त को भूल गया है, उसकी आँखों के आगे खड़ा वही बौना लक्ष्य अब विराट नज़र आता है।
उम्मीद कि निशानों की दौड़ में पिछड़ा सौरभ, फिर उठ दौड़ेगा और पॉडियम के सबसे ऊपरी पायदान पर चौधराहट से खड़ा होगा!
~अंकुर

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