Wednesday, 26 July 2023

मुकेश: कल और कल का शायर


 

  "कल कोई मुझको याद करे, 

क्यूँ कोई मुझको याद करे,

मसरूफ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे?

 मैं पल दो पल का शायर हूँ.."


  मुकेश साहब आपकी आवाज़ पल दो पल में नहीं सिमट सकती! आपकी आवाज़ की खनक मानवीय आवाज़ की खनक तक अमर है। आपकी आवाज़ की आहट भर से वक़्त आबाद हो जाता है। आप हर पल के शायर हैं। साल 1967 में आई यशराज साहब की दूसरी फ़िल्म का यह वही साल था, जो मुकेश की ज़िंदगी का आख़िरी साल था। डेट्रॉयट की धरती पर 23 अगस्त को मुकेश के होंठों की सरगम मौन हो गई थी। आज अपनी 100वीं जयंती मना रहे मुकेश ने ज़िंदगी को हाफ सेंचुरी के बाद ही अलविदा कह दिया था।


   "आवारा हूँ..." से मुकेश की मखमली आवाज़ दुनिया में इस क़दर आवारा हुई कि आज भी गीत-संगीत के मुरीदों के दिल में जगह बनाए हुए हैं। आर. के. स्टूडियो की फ़िल्म आवारा में, आज़ादी की शैशवास्था में साल 1951 में शौमैन 'राज कपूर' पर फ़िल्माए गए इस गीत ने मुकेश की आवाज़ को ऐसे आज़ाद किया कि चीन और सोवियत संघ में इस फ़िल्म को देखने के लिए सौ-सौ मिलियन टिकेट्स कटें, मध्य एशिया से लेकर दक्षिण एशिया और अमेरिका में मुकेश को कान नहीं, दिल खोलकर सुना गया। इस तरह मुकेश ने ख़ुद को पहले 'वैश्विक गायक' के तौर पर स्थापित किया; दुर्भाग्य कि मुकेश को इस मक़ाम तक पहुँचाने में अपना बड़ा स्थान रखने वाले भारतीय सिनेमा के पहले सूपर स्टार 'के. एल. सहगल' हम-आवाज़ और अपने शागिर्द के सुर को भारत की शरहद के बाहर से न सुन सकें।  


 मुकेश चंद्र माथुर को मुकेश बनाने में सहगल साहब ने बड़ी भूमिका निभाई थी। साल 1935 की पी. बरुआ द्वारा निर्देशित, शरत साहब के उपन्यास पर बनी फ़िल्म देवदास ने सहगल को ग़ुलाम भारत के लोगों के दिलों की धड़कन बना दिया था। ज़ुर्म-ओ-ज़ुल्म से जूझ रहे भारत को सहगल ने मुस्कुराने और मन बहलाने का मौक़ा दिया था। एक बार जब सहगल ने मुकेश की आवाज़ में रिकार्ड हुआ गीत सुना, तो वे बरबस ही कह उठें कि यह मैंने कब गाया था! मुकेश ने सहगल को अपनी प्रेरणा की उस गहराई में उतारा, जहाँ से वे उन्हीं के अंदाज़ में भीगकर निकलें। सहगल, मुकेश को अपनी आवाज़ के सिवा और क्या तोहफ़ा दें सकते थे! फिर भी उन्होंने अपनी अज़ीज़ हारमोनियम उन्हें भेंट की।


 22 जुलाई, 1923 को दिल्ली के इंजिनियर बाप लाला जोरावर चंद्र और माँ चाँद रानी के घर जन्में चाँद-सी शीतल, नरम, रूमानी और दर्द भरी तासीर के मालिक मुकेश ने अपनी बहन सुंदरी के ब्याह में गाना गाया, तो संबंधी, बराती और सिने से जुड़े मोतीलाल व तारा उनकी आवाज़ के मोहपाश में ऐसे फंसे कि उन्हें मुंबई का न्यौता दे दिया, लेकिन सरकारी पेशेवर और उसूलों के अड़ियल बाप ने मुकेश को जाने से मना कर दिया। इस बीच मैट्रिक के बाद मुकेश ने क्लर्क बनने की अधूरी कोशिशों के सिलसिले में शेयर ब्रोकर और ड्राई फ्रूट्स सेलर की भूमिका निभाई और लोक निर्माण विभाग में नौकरी भी की। मोतीलाल ने दुबारा नलिनी जयवंत की एक और फ़िल्म निर्दोष के लिए मुकेश के पिता को पत्र लिखा। इस बार पिता ने मुकेश को मुकद्दर आज़माने का मौक़ा दिया और मुकेश मुंबई चले गए।


  बतौर एक्टर-सिंगर मुकेश की पहली फ़िल्म निर्दोष (1941) फ्लाप हो गई और मुकेश घर चले आए। मुकेश ने संगीतकार खेमचंद प्रकाश के भाई जगन्नाथ प्रसाद से संगीत-गीत की कुछ शिक्षा ली। इसी वक़्त भारतीय गीत के कालजयी सुर लता और रफ़ी भी सिने दुनिया में दस्तक दे रहे थे। साल 1945 में रिलीज हुई फ़िल्म 'पहली नज़र' में संगीतकार अनिल बिस्वास के साथ मुकेश का गाया गीत 'दिल जलता है तो जलने दो' रेडियो पर बजा, तो लोग सहगल और मुकेश में फ़र्क न कर सकें। आर. के. स्टूडियो की साल 1949 में आई 'बरसात' फ़िल्म में 'छोड़ गए बालम' और 'पतली कमर है' जैसे गीतों के बाद मुकेश की मक़बूलियत दुनिया में पाँव पसारने लगी थी। इसके बाद राज कपूर ने मुकेश को पकड़ा और शंकर-जयकिशन के साथ जुड़कर एक-से-एक गीत-संगीत और फ़िल्में पर्दे पर उतारीं। मुकेश ने अपने 35 साल के सिने कैरियर में 500 से ज़्यादा फ़िल्मों में आवाज़ दी और 900 से ज़्यादा गीतों को सजाया। मुकेश ने रोशन, मदन मोहन, जयदेव, सरदार मलिक, एस. डी. बर्मन, नौशाद, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, ख्य्याम, आर. डी. बर्मन, सलिल चौधरी और रवींद्र जैन के संगीत में गीत पिरोएं। शंकर-जयकिशन के साथ तो मुकेश ने लगभग सवा सौ फ़िल्में कीं।  


   मुकेश को चार फ़िल्मफेयर अवार्ड मिलें‌, लेकिन एक भी अवार्ड आर. के. फ़िल्मों के लिए नहीं मिला। हालांकि पहला फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड 'अनाड़ी' फ़िल्म के गीत "सबकुछ सीखा हमने" पर मिला, जो राज कपूर पर ही फ़िल्माया गया था। दो अवार्ड मनोज कपूर की फ़िल्मों पर मिलें, जिनके साथ मुकेश ने कईं सदाबहार फ़िल्में दीं। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी साल में 'कभी कभी' फ़िल्म के ख़्य्याम के संगीत से रचे गीत "मेरे दिल में ख़्याल आता है" के लिए मुकेश को आख़िरी फिल्मफेयर अवार्ड मिला था। मुकेश को साल 1974 में सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी मिला था। यह राष्ट्रीय पुरस्कार मुकेश को कालजयी फ़िल्म 'रजनीगंधा' के गीत "कई बार यूँ ही देखा है, यह जो मन की सीमा रेखा है" के लिए मिला था। योगेश का लिखा और सलिल द्वारा संगीतबद्ध, रजनीगंधा का यह गीत सिने पदार्पण कर रहें अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा पर फ़िल्माया गया था। अपने उपन्यासों के लिए मशहूर रहीं लेखिका मन्नू भंडारी की 'यही सच है' कहानी पर निर्मित फ़िल्म रजनीगंधा ने उस वक़्त चार राष्ट्रीय पुरस्कार जीते थे। मन्नू को हिंदी नई कहानी का अग्रदूत कहने की वजह इस फ़िल्म ने साबित की थी।


  किसी का दर्द हो सके तो ले उधार, दोस्त दोस्त न रहा, जब कोई तुम्हारा हृदय तोड़ दे, जीना यहाँ मरना यहाँ, इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, कहीं दूर जब दिन ढल जाए जैसे दर्द भरे नग़मों में मुकेश ने आमजन के दर्द को बयाँ किया। मुकेश ख़ुद भी कहते थे, कि 10 लाइट गीत मिलें, तो मैं उन्हें छोड़कर, साथ में मिले 1 सैड गीत को गाना पसंद करूंगा। बहरहाल, मुकेश की गीत दुनिया में हर तरह के मूड के लिए गीत हैं; जैसे- सजन रे झूठ मत बोलो, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है, मेरा जूता है जापानी, किसी की मुस्कुराहटों पे निसार, क्या ख़ूब दिखती हो और होठों पर सच्चाई रहती है।


  दिल्ली के मुकेश, दिलवालों के मुकेश और दर्द-दंश की दस्तक मुकेश को दिली श्रद्धांजलि!


~अंकुर

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